
ECI Desk
मै घायल संपादक की तरह बोल रहा हूँ : अमिताभ अग्निहोत्री
नॉएडा : FM न्यूज़ चैनल के कॉनक्लेव “उड़ान” मेEditors Club Of India के अध्यक्ष अमिताभअग्निहोत्री जी का विशिष्ट अतिथि के रूप में रहना हुआ..उन्होंने विशाल कालरा जी तमाम तीखे सवालों के सहजता से जबाब दिये. ..
मैं आज अध्यक्ष नहीं, एक घायल संपादक की तरह बोल रहा हूँ—उस संपादक की तरह, जिसे हर दिन किसी न किसी सच की लाश अपने सामने दिखती है।
हमारी कलम को लोकतंत्र की धड़कन कहा जाता है, लेकिन सच ये है कि उसी कलम को सबसे ज़्यादा जकड़ा, दबाया और कुचला भी जाता है।
हम वो लोग हैं जो इस देश में सबसे पहले सच सुनते हैं… और अक्सर सबसे पहले सज़ा भी भुगतते हैं।
हम हर घटना का दर्द दुनिया तक पहुँचाते हैं, लेकिन हमारा अपना दर्द कोई नहीं सुनता।
हम दूसरों की आवाज़ बनते हैं, पर अपनी आवाज़ बचाने के लिए भी जंग लड़नी पड़ती है।
कभी सत्ता का दबाव, कभी पूँजी का बोझ, कभी अपने ही संस्थान की मजबूरियाँ—और उसके ऊपर जनता का वही पुराना सवाल: “पत्रकार सही क्यों नहीं लिखते?”
कोई ये नहीं पूछता कि लिखने दिया किसने?
खड़े होने दिया किसने?
सच कहने की कीमत चुकाई किसने?
हम अपने परिवारों से ज़्यादा समय देश को देते हैं, और बदले में क्या मिलता है—
संदेह, आरोप, और कई बार सुरक्षा तक नहीं।
हम रातों में खबरें लिखते हैं, लेकिन हमारी ही रातों की नींद कौन समझता है?
मित्रों, संपादक होना अब पेशा नहीं, अग्निपरीक्षा है।
हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है, हर दिन किसी न किसी शक्ति से लड़ना पड़ता है।
लेकिन यही वह जगह है जहाँ मैं आपसे एक वादा माँगता हूँ—
अब हम बिखरे नहीं रहेंगे।
अब कोई हमें खरीद नहीं पाएगा, कोई हमें डराकर नहीं रोक पाएगा।
हम एक दूसरे की ढाल बनेंगे, एक दूसरे की ताक़त बनेंगे।
एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया हमारी लड़ाई का मोर्चा है। अब आवाज़ दबेगी नहीं—अब हमारी आवाज़ गूँजेगी, और गूँज इतनी तेज होगी कि देश को सुनना ही पड़ेगा।
सच अब अकेला नहीं चलेगा।
हम उसके साथ हैं—और साथ मिलकर इतिहास बदलने आए हैं।
धन्यवाद. जय हिन्द जय एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया 🙏🙏
मैं आज अध्यक्ष नहीं, एक घायल संपादक की तरह बोल रहा हूँ—उस संपादक की तरह, जिसे हर दिन किसी न किसी सच की लाश अपने सामने दिखती है।
हमारी कलम को लोकतंत्र की धड़कन कहा जाता है, लेकिन सच ये है कि उसी कलम को सबसे ज़्यादा जकड़ा, दबाया और कुचला भी जाता है।
हम वो लोग हैं जो इस देश में सबसे पहले सच सुनते हैं… और अक्सर सबसे पहले सज़ा भी भुगतते हैं।
हम हर घटना का दर्द दुनिया तक पहुँचाते हैं, लेकिन हमारा अपना दर्द कोई नहीं सुनता।
हम दूसरों की आवाज़ बनते हैं, पर अपनी आवाज़ बचाने के लिए भी जंग लड़नी पड़ती है।
कभी सत्ता का दबाव, कभी पूँजी का बोझ, कभी अपने ही संस्थान की मजबूरियाँ—और उसके ऊपर जनता का वही पुराना सवाल: “पत्रकार सही क्यों नहीं लिखते?”
कोई ये नहीं पूछता कि लिखने दिया किसने?
खड़े होने दिया किसने?
सच कहने की कीमत चुकाई किसने?
हम अपने परिवारों से ज़्यादा समय देश को देते हैं, और बदले में क्या मिलता है—
संदेह, आरोप, और कई बार सुरक्षा तक नहीं।
हम रातों में खबरें लिखते हैं, लेकिन हमारी ही रातों की नींद कौन समझता है?
मित्रों, संपादक होना अब पेशा नहीं, अग्निपरीक्षा है।
हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है, हर दिन किसी न किसी शक्ति से लड़ना पड़ता है।
लेकिन यही वह जगह है जहाँ मैं आपसे एक वादा माँगता हूँ—
अब हम बिखरे नहीं रहेंगे।
अब कोई हमें खरीद नहीं पाएगा, कोई हमें डराकर नहीं रोक पाएगा।
हम एक दूसरे की ढाल बनेंगे, एक दूसरे की ताक़त बनेंगे।
एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया हमारी लड़ाई का मोर्चा है। अब आवाज़ दबेगी नहीं—अब हमारी आवाज़ गूँजेगी, और गूँज इतनी तेज होगी कि देश को सुनना ही पड़ेगा।
सच अब अकेला नहीं चलेगा।
हम उसके साथ हैं—और साथ मिलकर इतिहास बदलने आए हैं।
धन्यवाद. जय हिन्द जय एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया 🙏🙏